Thursday, March 13, 2008

मेरी खिड़की से क्या देखता हूँ

सूर्यास्त घंटे में आएगा, तब तक पहाड़ी पर धूप चमक रहा है, हालाँकि सड़क छाया में डूब गए। मैं पूर्व की तरफ़ देखता हूँ, जहाँ से मैं लगभग छह महीने पहले यहाँ आया। उसी तरफ़ से बादलों का एक ख़ौफ़नाक फ़ौज आ रहा है। एक आदमी मेरे नीचे सड़क पर चल रहा है, और हालाँकि बारिश हुई कम से कम एक हफ़्ता गुज़रा और उस की कोई निशानी नहीं है, पर उस आदमी के हाथ में छाता है। मैं इस स्थान के लोगों का एक लक्षण समझता हूँ कि वे हमेशा छाता रखते हैं, चाहे वह तेज़ धूप के नीचे चलते हैं (इस देश में लोग बारिश से डरते हैं, धूफ से नहीं। जो दृश्य हिंदी फ़िल्मों में होते हैं जिनमें आशिक-माशुक बारिश में नाचते हैं, वे मुझे अजीब ही लगते हैं)। कई बार मैं आकस्मिक बारिश में भीगा बन गया।

लेकिन बारिश यहाँ कम होती है, धूप ज़्यादा। हिंदुस्तान में यह स्थिती ऐसी ही थी लेकिन फ़र्क यह है कि यहाँ धूप में गरमी नहीं होती है। मैं कोई मौसम विज्ञानी नहीं हूँ लेकिन यहाँ के मौसम में कोई कमज़ोरी नहीं है। पर यहाँ की भूमी की कमज़ोरी ज़रूर है कि यहाँ किसी भी दिन पर बड़े से बड़े भुकांप की संभावता है जिसमें मेरा कमरा अवश्य नीचे गिरेगा। लेकिन तब तक में यहाँ पूरी सुख में रहूँगा।

मेरा शहर अपना विश्वविद्यालय के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ सात नोबेल प्राइज़ पुरस्कृत अध्यापक पढ़ाते हैं। यहाँ इतने नोबेल पुरस्कृत लोग आते रहते हैं कि उनकी गाड़ियों के लिए ख़ास जगहें रखी जाती हैं । मतलब है कि बुद्धिमान लोग बहुत हैं; लेकिन सामान्य बुद्धिमानी कम ही मिलेगी। एक और नोबेल से पुरस्कृत आदमी पढ़ाते थे; उसका नाम चेस्लौ मिलोज़ (czeslaw milosz) था के| क्योंकि वे पोलिश भाषा के प्रसिद्ध कवी थे इसलिए वे दोनों Slavic Studies और Comparative Literature विभागों में पढ़ाते थे। जब उनकी मृत्यु हुई तो वह पार्किंग स्पेस का सवाल उठा कि किस विभाग को जगह मिलेगी? इस बात पर बड़ी लड़ाई हुई। तीखेपन और ज़्यादा था इसलिए कि जो विभाग यहाँ Humanities कहलाते हैं (भाषा-विज्ञान, मनोविज्ञान, कला इत्यादी), उनको नोबेल पुरस्कार बहुत कम मिलता है--"ठोस" (hard) विज्ञानों को ज़्यादा।

जी हाँ, मेरे ख़्याल में आज तक में कई देशों में रह चुका हूँ: इर्लैंड, रूस, भारत, और अब कैलिफ़ोर्निया! यहाँ भी लोग पिज्जा ठीक से नहीं बना सकते हैं। न्यू यॉर्क की याद अभी भी आती रहती है, लेकिन यहाँ भी मुझे काफ़ी आनंद मिलता है, और सच बात यह है कि यहाँ से बहतर महौल शायद कहीं नहीं मिलेगा...

दोस्तों, मुझे पता नहीं कि कौन यह पढ़ेगा और एक बार फिर इस अजीबोगरीब हिंदी ब्लॉग पर ध्यान देगा। मैं यह भी नहीं बता सकता हूँ कि आगे मैं लिखता रहूँ कि नहीं। चाहूँगा ज़रूर, लेकिन मेरा इतना काम है कि मैं मुश्किल से खाना खाने का समय खोजता हूँ। लेकिन देखिये, आजकल मैं हिंदी खाता हूँ, पीता हूँ, और हिंदी के तकिये पर अपना सिर रखकर सोता हूँ। तो अगर मेरा दिमाग में इतनी हिंदी हो चुकी है, तो इस ब्लॉग पर कुछ फ़ालतू बातें डालना इतना कठिन काम नहीं होना चाहिए!

1 Comments:

Blogger उन्मुक्त said...

आपने अपने विश्वविद्यालय का नाम नहीं बताया।

14/3/08 9:14 PM  

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