Tuesday, March 18, 2008

तारे आकाश में फैल गए...

और मैं यहाँ बैठा हूँ निबंध लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। हालाँकि मेरी नौकरी यह कि मैं दो काम करूँ--पढ़ना और लिखना--लेकिन निबंध लिखते-लिखते मैं हमेशा आधा समय बरबाद करता हूँ। आज कारण यह है कि मैं एक हिंदी उपन्यास पर लिख रहा हूँ, और दुबारा पढ़ना नहीं चाहता हूँ। लेकिन हम सब जानते हैं कि स्मृति से हम निबंध थोड़े ही लिख सकते हैं। और मुझे गुस्सा आ रहा है इसलिए कि सात सालों के बाद मैं आसानी से हिंदी नहीं पढ़ सकता हूँ। सात सालों के बाद!

मैं ऐसा नहीं कह रहा हूँ कि मैं पढ़ नहीं सकता हूँ, या कि मुझे हमेशा शब्दकोश देखना है। बस यह है कि पढ़ते-पढ़ते मेरी आँखें कसती है; सर में दर्द आने लगता है: अँग्रेज़ी पढ़ने से इतना ज़्यादा दोगुना समय लगता है... उफ़!

3 Comments:

Blogger अमित पुरोहित said...

यों ही भटकते आपके ब्लॉग तक पहुँच गया । क्या खूब हैं जनाब आप भी ! क्या है भाई आप? मैं चौदह सालों में भी अंग्रेजी ठीक से नहीं लिख पाता। वैसे आप जैसे भी लिख रहे हैं, अच्छा कर रहे हैं।

23/6/08 3:39 AM  
Anonymous Tarun said...

ग्रेग, आपके पुराने चिट्ठे पर दिया गया नये चिट्ठे का लिंक ठीक से काम नही करता, कृप्या उसे ठीक कीजियेगा। और सुनायें आप कैसे हैं, आज काफी महीनों बाद आपके चिट्ठे पर आया हूँ वो भी अपनी एक पोस्ट से जिसमें मैंने आपके पुराने वाले चिट्ठे का उल्लेख किया था। आशा है आप को याद होगा।

10/7/08 6:38 AM  
Blogger Naveen said...

bahut khoob greg, keep on writing in hindi. apka expression original hai aur prays bahut sarahaneey.
shubhkaamnayein.

9/8/08 12:47 AM  

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