Tuesday, July 24, 2007

ब्लॉग्ज़ के मदद से हिन्दी सीखना

कुछ समय से मैं यह सोचा करता हूँ कि हिन्दी सीखने के लिए हिन्दी चिट्टाएँ बहुत फ़ायदेमंद हो सकती हैं। अभी भी राह दिखाई नहीं दिया है, लेकिन मैं फीर भी यह काम शुरू करना चाह रहा हूँ। मैंने यह विचार सोचा कि मैं एक दिलचस्प और आसान पोस्ट चुनकर उसका वर्नन के साथ एक शब्दावली दूँ। कहने की कोई ज़रूरत नहीं कि लेखक की सहायता भी बहुत ही अच्छी रहेगी।

मैं इस पोस्ट से यह काम शुरू करता हूँ, और हालाँकि दो शब्द मुझे मालुम नहीं, फीर भी मुझे लगता है कि छात्रों को फ़ायदा मिलेगा। यह बात भी है कि मैं अभी भी एक छात्र हूँ और आशा है कि हमेशा रहे! सो अगर आपको उन नीचेवाले शब्दों के अर्थ मालुम हैं जिनकी कोई प्रतिभाषा नहीं, तो एक टिप्पानी में हमें बता दीजिए।

ख़त: इस के साथ मैंने पहली बार कुछ अँग्रेज़ी भी लिखी है। हिन्दी पढ़नेवाले, बुरा मत मानिए, यह छात्र के लिए है।

Learn Hindi with Blogs

For a while now, I've been wondering how to make use of the growing Hindi blogosphere as a learning resource. I'm still not sure how to go forward, but one idea that I want to start right away is a series of posts picking out an interesting and readable post, and after giving a quick summary, detailing the relevant vocabulary. Of course, I invite and welcome the assistance of the blog writer him- or herself.

So, to begin: Kamran Perwaiz tells us about a new development in Delhi transportation. Hint: it's nothing good. I've put difficult words below:

तौबा f-"abjuring sin", repent
सफ़र m-journey
बल्कि -rather (as in: he's not your friend, (rather) he's a thief!): used to express disagreement with previous clause
तुगलकी
निजी -private
रफ़्तार f-speed
जानलेवा -mortal, deadly
आकडे
रौंदना -to thrash, trample
कुचलना -to crush, pound
रूखा -harsh, blunt, indifferent
नदारद -absent
फीसद -percent
परिवहन m-transportation (formal)
उपयोगm-use (formal)
हो हल्ला
पीसना -to grind, oppress; पीसी जा रही है -to be crushed (if object is feminine)
कामकाज़ी -working
मेहनतकश -hard-working, laboring
मज़बूर -helpless

मैं वापस आ गया, यानी

एक और बार मुझे कहना पड़ेगा कि मैं वापस आ गया और मुझे उनसे माफ़ माँगना पड़ेगा जो अभी-भी यह ब्लॉग पढ़ता है। अभी आप में से कौन-कौन बाकी है, यह मुझे बिल्कुल पता नहीं। पर, क्या करूँ?

बात एक: मुझे थोड़ा-सा ताज्जुब कि मैं बहुत ज़्यादा और लिखा करता था जब मैं अमेरिका में रहता था, और जब मैं हिन्दुस्तान गया, तो मैंने कमोबेस ब्लॉग को छोड़ दिया। लेकिन एक तरफ़ से समझा जा सकता है कि जितनी हिंदी मुझे बोलनी पड़ती है और लिखनी पड़ती है, इतनी कम ज़रूरत है ब्लॉग की। और एक और बात है कि मैं इतना व्यस्त था अपनी पढ़ाई में कि ब्लॉग लिखने का फ़ुरसत कभी निकला ही नहीं। और यह मेरी एक कमज़ोरी है कि मैं एक ख़राब correspondent हूँ--यानी मैं ठीक से सम्पर्क नहीं रखता हूं दोस्तों का।

लेकिन!

मैं वापस आ गया! यानी हिमालय के किसी पहाड़ी जंगल से नहीं, बल्कि देश से--यानी मैं न्यू यॉर्क में हूँ। और न्यू यॉर्क से में एक हफ़्ते में एक और नया देश जा रहा हूँ: कैलिफ़ोर्न्या! (दोस्तों, याद रखिए कि जितना फ़र्क है बम्बई और कलकत्ता के बीच में है, इतना ही फ़र्क है न्यू यॉर्क ओर कैलिफ़ोर्न्या) वहाँ University of California, Berkeley में अपनी हिन्दी की पढ़ाई अगे बढ़ाऊँगा

(एक ख़ुशी की बात है कि मेरी सरकार काफ़ी दानशील इस मामले में; हिन्दुस्तान में मेरा एक अध्यापक ने मज़ाक किया कि अगर कई पंडितों ने एक हवाई जहाज़ के ज़रिए के किसी अम्रीकी इमारत को गिराया होता, तो आज अम्रीकी सरकार संस्कृत सीखने के लिए भी पैसा दे रही होती! सच यह है कि अख़िर यह बात उसकी समझ में आई कि अंग्रेज़ी दुनिया की केवल भाषा नहीं है; आजकल मैं सिवाय इस बात के अपनी सरकार से बिल्कुल सहमत नहीं हूँ--मगर! अम्रीका में हम कहते हैं: तौफ़ेवाले घोड़े के मुँह में न देखो; क्या किसी को मालुम कोई इस जैसे-वाला मुहावरा हिन्दी में?)

एक और बड़ी ख़ुशी की बात: मुझे हिन्दी सिखाने का मौका मिला! मुझे भी ताज्जुब हुआ, लेकिन सब कुछ ठीक रहा। अंत में मैंने बहुत ही ख़ुद सिखा, और मेरे विद्यार्थियों ने भी। दरअसल मैं घबरा रहा था कि चुँकि हिंदी मेरी माँ-भाषा नहीं है, इसलिए वे मुझे उनके अध्यापक के लिए स्विकार नहीं करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, और क्लास के बाद एक ने मुझे बताया कि उसका ज़ोर बढ़ाया गया इस बात से कि अगर एक विदेशी हिन्दी सीख सकता है तो मैं क्यों नहीं सिखूँ? और मुझे लगता है उन्होंने ज़रूर बहुत सीख लिया--खासकर अगर मैं याद रखूँ कि यह बस तीन हफ़्ते का क्लास था (summer-school)|

ख़ैर मैं वापस आ गया, और यहाँ अपनी हिंदी को सँभालने के लिए मेरा यह इरादा है कि मैं इस ब्लॉग पर और भी लिखूँ, और मन में कई विचार भी है। एक है कि चूँकि मैं सिखाता जाना चाहता हूँ, इसलिए में उस के लिए इस ब्लॉग पर कुछ काम करना चाहता हूँ। इसलिए कभी-कभी मैं थोड़ी अँग्रेज़ी लिखूँगा हिंदी छात्रों के लिए।

सो दोस्तों, अगर आप अभी भी पढ़ रहे हैं, पढ़ते रहिये: मैं आपको नहीं बता सकता हूँ कि मैं रोज़ लिखूँगा, मगर यह वादा ज़रूर कर सकता हूँ कि जो भी मैं लिखता, मैं अपनी ही शैली में लिखूँगा और आपको कई मज़ेदार चीज़ें हमेशा बताने की कोशिश करूँगा। और कहने की कोई ज़रूरत नहीं है कि अगर मैं कभी कोई गलत करूँ, तो बता दीजिए (हमेशा की तरह)!

आगे: बाप रे बाप! मुझे बहुत ख़ुशी है कि सब लोग मुझे भुल गए नहीं, और इससे भी कि मुझे एकदम जवाब मिला! Udan Tashtari लिखता है कि ""दान की बछिया के दाँत नहीं गिने जाते'. यानि जब कोई गाय खरीदता है तो उसकी परख करने दाँत गिनता है मगर अगर गाय दान में मिल रही हो, तो क्या दाँत गिनना? पैसे तो लग नहीं रहे. :)" अरे वाह! अच्छी बात है कि वही मुहावरा चलता है हिन्दुस्तान में जो अम्रीका में चलता (और फीर भी चलता है हालाँकि मैं एक न्यू-यॉर्क का रहनेवाला हूँ जो, सच बताऊँ, घोरे के दाँतों से डरता हूँ!) ।