Wednesday, November 29, 2006

मेरा नाम

मुझे बहुत ख़ुशी थी कि इतने लोगों ने मेरे पीछले ख़त पर टिप्पनी लिखी; लगता है कि किसी तरह से मैंने एक बात की जो आप लोगों के मनों में गूँजती गयी, और वह एक ख़ास और अनूठी बात ही है जो ऐसे भाव उभार सकती है। (काश वह इतनी प्रभावित होती कि मैं और लिख पाऊँ।)

मगर इन टिप्पणियों में लिखा गया था कि लोग मेरे बारे में और जानना चाहता है। क्यों अंत में मैं इकलौता बच्चा हूँ, मैं अपनेबारे बात करना बहुत पसंद करता हूँ। तो अब छोटी-सी तस्वीर बनाने की कोशिश करूँगा।

मेरे देश में मेरा नाम इतना अजीब नहीं था (यानी मुझे कभी नहीं वह परेशानी थी जो मेरे स्कूल के दोस्त रंजीत पर पड़ी, जिसको हमेशा "रांजी" कहता था।) लेकिन बहुत आम भी नहीं था। इसमें कुछ राहत मिली, क्योंकि नहीं चाहता था कि मैं कोई "क्रिस" या "माईकल" होऊँ, जिसको पूरे जीवन में बटकना चाहिए होगा दुसरे क्रिसों और माईकलों से मिलते-मिलते। मुझे बहुत कम किसी दुसरे "ग्रेग" से मिलता है, और जब भी ऐसा होता है, तभी संदेही हो जाता हूँ: यह कौन है जो मेरे अपने नाम के शाल में इधर-उधर फ़ैरता रहता?

लेकिन अगर वह बड़ा लाभ उठा सकता हूँ अपने नाम से, यह कमज़ोर भी है कि अगर मैं केवल "ग्रेग" हूँ जो मैं जानता हूँ, तो उस नाम की आवाज़ मेरी ही है। मतलब है कि चौबीस सालों बाद जो भी नसफल मेरी ज़िंदगी में, जो भी लज्जित (सही?), वह मेरा ही है - और मेरे नाम का। यानी जब में नौजवान था और हमेशा उदासी और self-absorption में डुबा हुआ था, तो मेरे नाम की आवाज़ सुनते पर ही शर्म से काँपता था।

अभी मैं इतना गंभीर नहीं हूँ और भी मैं रहता हूँ ऐसा जगह में (जयपुर) जहाँ मेरा नाम इतना आम नहीं। बहुत शुक्रगुज़ार हूँ कि एक ग्रेग चैपल इंडिया के क्रिकट टीम का मैनजर है।

एक बार मैंने पढ़ा कि मेरा नाम का मतलब है "देखनेवाला" है युनानी में। इससे दो और मतलब खींचे जाते है: गडरिया एक है, और इसलिए कैथलिक पोपों के लिए लोकप्रिय है: याद रखो कि हमारा कैलंडर Gregorian है:
किसी पोप ने बनाया। मगर एक और मतलब जो मुझे और अच्छा लगता है: चौकिदार। मैं कम सोता हूँ, और सच में अपना मन लगभग ग्यारह बजे ही तेज़ से चलने लगता है। मैं आदत से सोचना चाहता हूँ कि मैं पूरी रात दुनिया को देखबाल कर रहा हूँ: कम से कम एक दिन मैं ऐसा करूँगा अपने बच्चों के लिए।

Sunday, November 05, 2006

मेरे ब्लॉग का नाम

अभी श्रिश ने कहा कि मेरे ब्लॉग का नाम नहीं समझ पया। मैं सोचता हूँ कि श्रिश केवल नहीं है इस सवाल पुछने में। तो मैं समझाने की कोशिश करूँगा।

पहली बात है जब मैंने फ़ैसला किया कि मेरे ब्लोग के नाम को बदल दूँ, तो सोचते-सोचते मुझे कोई अच्छा नाम नहीं सुलझा। लोग कह सकते हैं कि शिर्षक में कुछ नहीं असली मतलब है, लेकिन फीर भी हम सब जानते है कि एक नाम में बहुत ही अर्थ है। मसलन मेरा नाम ग्रेग है और इंडिया में हिन्दी बोलनेवाले थोरे-से मुश्किल से उच्चारण कर पाते हैं (क्रेक? ग्रग? गर्ग?), लेकिन मैं कभी नहीं किसी नया नाम लूँगा जैसे चीनी लोग कभी लेते हैं। मेरा नाम ग्रेग है और वहीं मेरा नाम है, गौरव नहीं होगा :)। मैं भी महसूस करता हूँ कि जब हिन्दुस्तानी लोग बाहर जाते हैं तो अच्छी बात नहीं है कि "समीर" की जगह में समीर अपने-आप को "सैम" कहे। अगर आपका नाम की उच्चारण मुश्किल है तो लोग उच्चारण करने की कोशिश करने से कुछ सिखें, और सबसे ज़रूरी बात मेरेलिए यह है कि "समीर" का नाम में कोई ख़ास मतलब है जो "सैम" में नहीं।

ख़ैर नाम में कुछ मतलब ही हैं। (मसलन मैंने सुना है कि मेरे अपने नाम का मतलब है "रात का चौकिदार" येहूदी में।)

तो मैं कोई ठीक नाम नहीं ईज़ाद कर पा रहा था अपने ब्लॉग के लिए तब एक शाम मैं अपने पंखे को घूर रहा था। मैं अपने पंखे को घूरा करता हूँ जब भी मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ, या जब कोई गड़बड़ है (ठीक इस्तेमाल?) या जब कोई अमूर्त चीज़ को ध्यान दे रहा हूँ। तब तो मुझे ध्यान आया कि इस पंखे पर एक नाम छपा हुआ (दुलहन)। अंग्रेज़ी में हम कभी कहते "Eureka!" जब हम ऐसा सांस (लिंग ठीक है? और इस्तेमाल?) लेते हैं। एकाएक मुझे पता चला मेरे ब्लॉग का नाम।

तो शायद अभी हज़ीर है कि इस नाम में कोई ठीक नाम नहीं है इत्तेफ़ाक़ के अलावा। लेकिन यह सही नहीं। एक मतलब हो सकता है कि मैं कोई अजीब और नामाज़ेदार मज़ाक कर रहा हूँ एक मशहूर मोहवरे पर। लेकिन वह आकस्मिक है क्योंकि जब मैंने नाम दिया तो मैं उस के बारे में नहीं सोच रहा था। एक और मतलब है कि मैं मज़ाक कर रहा हूँ कि मैं इतनी गलतियाँ करता हूँ लिंग की। पर वह भी आकस्मिक। पहला मतलब यह है (और वह सच मैं थोरा-सा उदास है) कि मैं सोच रहा था कि जब तक मैं असली दुलहन मिल पाता हूँ, तब तक मेरी केवल साथी यह पंखा होगा!

तो अभी मुझे आशा है कि मेरे ब्लॉग का नाम और साफ़ है। सच में इस लेखने के पहले मेरे लिए भी उसका मतलब इतना साफ़ नहीं था...

Friday, November 03, 2006

अन्ना करिनना में एक दृष्य है जिसका याद अभी है मुझे. एक औरत और एक आदमी वृक्ष में सैर कर रहे हैं। प्यार का कोई संभवना है दोनों के बीच में, और वृक्ष में वह पल पहुँचता है जिसमे आदमी को फ़ैसला करना चाहता है। शयद दोनों कोई पेड़ को देख रहे हैं, यह कोई गूल...

आदमी कुछ नहीं कहता है, और पल गुज़रता है। किसी तरह से दोनों यह जानते हैं कि पल गुज़रा है, और अभी वह संभवना नहीं है।

क्या ऐसा अनुभव कभी हुआ आपको?

(ख़त: इस बार मैंने पकड़ लिया मौका :)।)