Thursday, December 07, 2006

अदीब ने गौर से देखा - वक्त और सिकुड़ गया। फिर वह एक ख़ूबसूरत सुनहले पंछी जैसे सोनहंस में बदल गया, जैसा पंछी कभी बाबर ने आगरा की गद्दी जीतने के बाद पहली बार देखा था। सोनहंस हवा में उठती-गिरती लहरों की तरह पंख चलाकर एक दिशा की ओर उड़ने लगा। उसके पंखों में कोई आवाज़ नहीं थी लेकिन तरह-तरह की रोशनियों के टुकड़े उसके बर्फ़ से सफ़ेद पंखों को छूते हुए गुज़रने लगे... और रोशनी के वे टुकड़े कागज़ों की तरह इधर-उधर उड़ने लगे...
देखते-देखते वे कागज़ जैसे पूरे ब्रह्मांड में भर गए और फिर ग्रन्थों की शक्ल में तब्दील होने लगे... बादशाहनामा, अमले सोलह, आलमगीरनामा, लतीफ़-उल-अख़बार, तारीख़े शुजाई, मुतख़ाबुल-लुबाब, मसीरुल-उमरा, दबिस्तान-उल-मज़ाहिब-ओशी... मनुची और बर्नियर के वृत्तान्तों के पन्ने फड़फड़ाने लगे... दस्तावेज़ों का एक महल-सा बन गया!

-कितने पाकिस्तान से

मैंने वह लिखा क्योंकि मैं इस उपन्यास की संरचना पर ज़िक्र करना चाहता हूँ। कई महिनों से (शुरू करके मैंने उसको छोड़ दिया अब तक) मुझे बहुत दिलचस्पी है इस उपनयास में, और अभी भी ठीक से नहीं समझा सकता हूँ। शायद मेरेलिए सब से रहस्यभरी बात यह है कि इस उपन्यास का मुख्य-पात्र, जिसको अदीब कहलाता है, मेरी नज़र में पूरी तरह से अस्तित्व नहीं। यानी मैं मानता हूँ कि वह इस कहानी का केन्द्र है, पर उसकी अभीप्रेर्णा और उसकी फितरत ठीक नहीं देख सकता हूँ। सच में अगर आपने पढ़ा हो तो आप भी सोचें कि यह अदीब के पास एक कमज़ोरी है (सही शब्द?) भाषण देने की; यानी, कभी वह बोलता रहता है, और हर बार कोई नहीं सुन रहा है।

फीर भी वह इस उपन्यास की चावी है। मेरी दृष्टि में यह साबित गया जब वह सलमा के पास था मौरीशस में। मैं ठीक से नहीं जानता हूँ इस हिस्सा का मतलब, जानता ही हूँ कि वह उपन्यास के केन्द्र में ही है। शायद इन सब में यह सच है कि हम, जो आम इंसान ही हैं, इतिहास और हमारे ऐतिहासिक और धार्मिक हिंसा से भागने की कोशिश करते रहते हैं?

ख़ैर, यही इतिहास की तस्वीर ज़रूरी है जो यहाँ मैंने उतारा: एक हंस जिसकी पंखें कागज़ से बनती हैं, ग्रन्थों और अलग-अलग नामाओं से बनती हैं।

और हाज़ीर है मानिश कि मैं आपसे पूरी तरह से सहमत नहीं हूँ: मैं इससे राज़ा हूँ कि अगर आप बस उसके घोषित संदेह की दृष्टि से ही देखें तो वह ज़रूर उभाव होगा, लेकिन मैं यह भी महसूस करता हूँ कि यह उपन्यास सिर्फ़ बेवजह हिंसा की विरोध में है, बल्कि कुछ और है उसमे, और सच मैं सोचता हूँ कि जो उसका राज़ हो, वह उसके कथा शिल्प में ही है...

लेकिन क्योंकि जो भी मैं पढ़ता हूँ, उस पर इतना ध्यान देना पड़ता है, इसलिए मैं शायाद और देखता हूँ जो हक़ीक़तन नहीं।

4 Comments:

Blogger Pankaj Bengani said...

मैने इस उपन्यास को पढा नही है। अन्यथा कुछ सोच सकता था

7/12/06 9:35 PM  
Anonymous Anonymous said...

aap ka blog padhane ke baad behad khusi hui..laga ki is sansaar mein abhi bhi acchi cheezon ki kadra karane wale maujood hai..aap yun hi likhate rahen heamesha!

6/2/07 10:57 AM  
Blogger Shrish said...

ग्रेग जी आपको यहाँ पर टैग किया गया है। कृपया जवाब अवश्य लिखें।

आपके जवाब की प्रतीक्षा में।

24/2/07 11:11 PM  
Blogger Shrish said...

और हाँ चाहे आप यह कमेन्ट कितने ही समय बाद उदाहरण के लिए एक साल बाद भी पढ़ें तब भी उत्तर अवश्य दें। हम आपको भूले नहीं हैं।

24/2/07 11:13 PM  

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