Friday, November 03, 2006

अन्ना करिनना में एक दृष्य है जिसका याद अभी है मुझे. एक औरत और एक आदमी वृक्ष में सैर कर रहे हैं। प्यार का कोई संभवना है दोनों के बीच में, और वृक्ष में वह पल पहुँचता है जिसमे आदमी को फ़ैसला करना चाहता है। शयद दोनों कोई पेड़ को देख रहे हैं, यह कोई गूल...

आदमी कुछ नहीं कहता है, और पल गुज़रता है। किसी तरह से दोनों यह जानते हैं कि पल गुज़रा है, और अभी वह संभवना नहीं है।

क्या ऐसा अनुभव कभी हुआ आपको?

(ख़त: इस बार मैंने पकड़ लिया मौका :)।)

2 Comments:

Blogger Pankaj Bengani said...

कहाँ खो गए थे बन्धु?

हाँ ऐसा अनुभव हुआ ना... एक बार क्या दो तीन बार हुआ है.. ;-)

3/11/06 2:19 AM  
Anonymous श्रीश । Shrish said...

भाई साहब, आपके ब्लॉग के नाम का मतलब समझ नहीं आया।

4/11/06 11:13 PM  

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