Monday, October 30, 2006

डल्हूसी से पठानकोट तक

चम्बा से दिल्ली का बस १२:४० ही पर चली गई। ख़ुशी की बात है कि यह बस ज़्यादातर ख़ाली है: धूप चमक रहा है और लगता है कि लोग चम्बा के मैदान पर बैठने से सतुष्ट है आज। दरअसल डल्हूसी के बस स्टंड के पहले मेरे सिवाय अखिरी सिवारी उतरेगी डल्हूसी कॉन्ट पर। चम्बा के बाद रासता पहाड़ियों के पीठ पर चलता है और निचे पेरों के बीच हरा-नीला पानी की दृष्य आती है। दूरी में असली पहाड़ दिखाई देते हैं--नहीं जानता हूँ उनके नाम। लेकिन यह रवी (sp?) नदी का रंग एक है जो मैंने अब के पहले बस अपनी परिकल्पना में देखा है--गहरा नीला का रंग है, जैसे एक बच्चे ने क्रेयॉन से भरा है। चलती हुई बस में देवदार बीतते हैं और जब नज़र साफ़ है तब मैं जलदी-से फ़ोटो खींचने की कोशिश करता हूँ। बाद मैं कम्प्यूटर पर देखूँगा कि ज़्यादातर over-exposed होंगी, लेकिन खींचते-खीचते मज़ा आता है।

जब सवारी उतरती है तो मैं चुपके-चुपके एक सिग्रेट पीता हूँ: सख़्त मना है! किसी को चिन्ता नहीं है इससे...

डल्हूसी पे याद दिलाया जाता है कि यह असली हिन्दुस्तानी बस है जब सामान से लादे हुए भीड़ हमारा इन्तज़ार कर रहे हैं। बहस चलने लगता है कि किसि के पास सीट है और कितने सामान बस रख सकते है... कुछ टिबट्टी लोग, कुछ लोग कश्मीरी लगते हैं, कुछ सीधे-सीधे टूरिस्ट लगते हैं, लेकिन सभी के पास टी०वी० का डब्बा है जो रस्सियों से बन्धा गया है: मैं कुछ परेशानी से अपने सीट को निगाह डालता हूँ, जहाँ पर मेरी निशानी एक झमकता शाल, एक आधा ख़ाली पानी-बोटल, एक धूरे-पन्ने का उपन्यास (मौरीशस का जुआ-घर लुटा जाएगा!)

डल्हूसी के बाद मैं सोचता हूँ कि पहाड़ों की दृष्य ख़त्म होगा और अपना कैमरा अपने बैग मैं रख देता हूँ। लेकिन तब बस ऐसे इलाके में प्रवेश करती है जो इस सफ़र में सबसे लाजवाब तस्वीर देगी। बस ऊंची पहाड़ियों से नीचे चलने लगती है। यहाँ ज़मीन खड़ी नहीं, पत्थरों से बनी नहीं है; यानी, यहाँ पे कुछ और गरमी होती है, देवदार खत्म हो जाते है और उन के जगह में कुछ और छोटे पेड़ है जो देवदार जैसे लगते है पर देवदार नहीं कहलाते हैं (आप लोग सब जानेंगे उनको) और भी यहाँ पे कुछ झाड़ हैं जिससे कोई अजीब फल लटकाती है--मैंने कभी नहीं देखा है। पर अभी ज़मीन कोई लाल मिट्टी से प्रकृतिस्थ है और मेरे हिसाब से गुज़रते हुए सालों की बारिश ने ऐसा प्रभाव दिया है कि अभी छोटी और नौकदार पहाड़ियाँ पंजाब से उठ पड़ती हैं, कुछ चाकूओं जैसी, कुछ हथौड़ों जैसी।

अभी शायद साड़े चार बज रहे हैं और सूरज नीचे चलने लगा है। सब कुछ लाल और सोनी है, और पहाड़ियों के ऊपर पर हरी-हरी घास चमक रहा है। मैं देख सकता हूँ छोटे सड़क है और तभी इच्छा आता है कि मेरेपास मोटर्साईकल हो, पर बस चलती रहती है। दूरी में अभी भी हिमलय के बड़े पहाड़ दिखते है। मेरे बायिने तरफ़ पर एक सोती हुई औरत का सर मेरे कांध पर है...

बाद में बहुत गर्द होगा और आम हिन्दुस्तान की निशानियाँ दिखाई देगीं--खेती, राम मंदिर गुरुद्वारा, ऑटोज़, और अखिर, गहरे अंधेरे में डुबे हुए, पठानकोट। लेकिन अभी मुझे बहुत ख़ुशी होती है कि मेरा कैमरा अपनी हाथों में नहीं है, क्योंकि मुझे मालुम है कि मैं कभी नहीं ठीक से खींच सकूँगा जिसको अब देख रहा हूँ।

यह भी जानता हूँ कि इस विदेशी ज़ुबान में ठीक से नहीं दिखा सकता हूँ, लेकिन मैंने कम-से-कम कोशिश किया है। आप लोग जो वहाँ गए हैं, यह तस्वीर कैसी है? और बताइये कुछ और इस जगह के बारे में, मेरेलिए एकदम हैरानी की बात थी जब मैंने ऐसी दृष्य देखी... और भी पता करना चाहता हूँ कि प्राकृतिक जगहों की दृष्यएं कैसे दिखाऊँ? मैं महसूस करता हूँ कि मेरी शबदावली में इस के लिए इतने शब्द नहीं हैं...

4 Comments:

Blogger संजय बेंगाणी said...

आपकी हिन्दी तो काफी सुधर गई है.
अच्छा वर्णन किया हैं, आपने.
आप भारत यात्रा का पुरा आनन्द ले तथा इसका उपयोग हिन्दी सिखने में भी करे.
आशा हैं आप इसी तरह अपनी यात्रा के बारेमें लिखते रहेंगे.

30/10/06 9:01 PM  
Blogger Pratik said...

हालाँकि मैं कभी डलहौजी नहीं गया हूँ, लेकिन सुना है कि बहुत सुन्दर जगह है। वैसे, आपकी हिन्दी भी दिन-ब-दिन निखरती जा रही है। :-)

30/10/06 9:47 PM  
Blogger Pathania said...

सभी लिखने वाले अपने आप को बहुत ही होशियार समझते हैं। दूसरों ने जो भी लिखा है बहुत ही अच्छा लिखा है।

3/10/08 2:59 AM  
Blogger Pathania said...

मैं चम्बा का रहने वाला हुँ और वर्तमान में मैं शिमला में रह रहा हुँ और अकसर घर जाता रहता हुँ और ड़लहोजी रास्ते में पडता है जो काभी हद तक एक खुबसूरत जगह है।
वैसे चम्बा जाने के लिए दूसरा रास्ता कांगडा से वया चुवाडी, जोत होकर जाता है जो बहुत ही अच्छा अनुभव है।

3/10/08 3:07 AM  

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