मैं वापस आ गया, यानी
एक और बार मुझे कहना पड़ेगा कि मैं वापस आ गया और मुझे उनसे माफ़ माँगना पड़ेगा जो अभी-भी यह ब्लॉग पढ़ता है। अभी आप में से कौन-कौन बाकी है, यह मुझे बिल्कुल पता नहीं। पर, क्या करूँ?
बात एक: मुझे थोड़ा-सा ताज्जुब कि मैं बहुत ज़्यादा और लिखा करता था जब मैं अमेरिका में रहता था, और जब मैं हिन्दुस्तान गया, तो मैंने कमोबेस ब्लॉग को छोड़ दिया। लेकिन एक तरफ़ से समझा जा सकता है कि जितनी हिंदी मुझे बोलनी पड़ती है और लिखनी पड़ती है, इतनी कम ज़रूरत है ब्लॉग की। और एक और बात है कि मैं इतना व्यस्त था अपनी पढ़ाई में कि ब्लॉग लिखने का फ़ुरसत कभी निकला ही नहीं। और यह मेरी एक कमज़ोरी है कि मैं एक ख़राब correspondent हूँ--यानी मैं ठीक से सम्पर्क नहीं रखता हूं दोस्तों का।
लेकिन!
मैं वापस आ गया! यानी हिमालय के किसी पहाड़ी जंगल से नहीं, बल्कि देश से--यानी मैं न्यू यॉर्क में हूँ। और न्यू यॉर्क से में एक हफ़्ते में एक और नया देश जा रहा हूँ: कैलिफ़ोर्न्या! (दोस्तों, याद रखिए कि जितना फ़र्क है बम्बई और कलकत्ता के बीच में है, इतना ही फ़र्क है न्यू यॉर्क ओर कैलिफ़ोर्न्या) वहाँ University of California, Berkeley में अपनी हिन्दी की पढ़ाई अगे बढ़ाऊँगा
(एक ख़ुशी की बात है कि मेरी सरकार काफ़ी दानशील इस मामले में; हिन्दुस्तान में मेरा एक अध्यापक ने मज़ाक किया कि अगर कई पंडितों ने एक हवाई जहाज़ के ज़रिए के किसी अम्रीकी इमारत को गिराया होता, तो आज अम्रीकी सरकार संस्कृत सीखने के लिए भी पैसा दे रही होती! सच यह है कि अख़िर यह बात उसकी समझ में आई कि अंग्रेज़ी दुनिया की केवल भाषा नहीं है; आजकल मैं सिवाय इस बात के अपनी सरकार से बिल्कुल सहमत नहीं हूँ--मगर! अम्रीका में हम कहते हैं: तौफ़ेवाले घोड़े के मुँह में न देखो; क्या किसी को मालुम कोई इस जैसे-वाला मुहावरा हिन्दी में?)
एक और बड़ी ख़ुशी की बात: मुझे हिन्दी सिखाने का मौका मिला! मुझे भी ताज्जुब हुआ, लेकिन सब कुछ ठीक रहा। अंत में मैंने बहुत ही ख़ुद सिखा, और मेरे विद्यार्थियों ने भी। दरअसल मैं घबरा रहा था कि चुँकि हिंदी मेरी माँ-भाषा नहीं है, इसलिए वे मुझे उनके अध्यापक के लिए स्विकार नहीं करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, और क्लास के बाद एक ने मुझे बताया कि उसका ज़ोर बढ़ाया गया इस बात से कि अगर एक विदेशी हिन्दी सीख सकता है तो मैं क्यों नहीं सिखूँ? और मुझे लगता है उन्होंने ज़रूर बहुत सीख लिया--खासकर अगर मैं याद रखूँ कि यह बस तीन हफ़्ते का क्लास था (summer-school)|
ख़ैर मैं वापस आ गया, और यहाँ अपनी हिंदी को सँभालने के लिए मेरा यह इरादा है कि मैं इस ब्लॉग पर और भी लिखूँ, और मन में कई विचार भी है। एक है कि चूँकि मैं सिखाता जाना चाहता हूँ, इसलिए में उस के लिए इस ब्लॉग पर कुछ काम करना चाहता हूँ। इसलिए कभी-कभी मैं थोड़ी अँग्रेज़ी लिखूँगा हिंदी छात्रों के लिए।
सो दोस्तों, अगर आप अभी भी पढ़ रहे हैं, पढ़ते रहिये: मैं आपको नहीं बता सकता हूँ कि मैं रोज़ लिखूँगा, मगर यह वादा ज़रूर कर सकता हूँ कि जो भी मैं लिखता, मैं अपनी ही शैली में लिखूँगा और आपको कई मज़ेदार चीज़ें हमेशा बताने की कोशिश करूँगा। और कहने की कोई ज़रूरत नहीं है कि अगर मैं कभी कोई गलत करूँ, तो बता दीजिए (हमेशा की तरह)!
आगे: बाप रे बाप! मुझे बहुत ख़ुशी है कि सब लोग मुझे भुल गए नहीं, और इससे भी कि मुझे एकदम जवाब मिला!
Udan Tashtari लिखता है कि ""दान की बछिया के दाँत नहीं गिने जाते'. यानि जब कोई गाय खरीदता है तो उसकी परख करने दाँत गिनता है मगर अगर गाय दान में मिल रही हो, तो क्या दाँत गिनना? पैसे तो लग नहीं रहे. :)" अरे वाह! अच्छी बात है कि वही मुहावरा चलता है हिन्दुस्तान में जो अम्रीका में चलता (और फीर भी चलता है हालाँकि मैं एक न्यू-यॉर्क का रहनेवाला हूँ जो, सच बताऊँ, घोरे के दाँतों से डरता हूँ!) ।