Tuesday, March 18, 2008

तारे आकाश में फैल गए...

और मैं यहाँ बैठा हूँ निबंध लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। हालाँकि मेरी नौकरी यह कि मैं दो काम करूँ--पढ़ना और लिखना--लेकिन निबंध लिखते-लिखते मैं हमेशा आधा समय बरबाद करता हूँ। आज कारण यह है कि मैं एक हिंदी उपन्यास पर लिख रहा हूँ, और दुबारा पढ़ना नहीं चाहता हूँ। लेकिन हम सब जानते हैं कि स्मृति से हम निबंध थोड़े ही लिख सकते हैं। और मुझे गुस्सा आ रहा है इसलिए कि सात सालों के बाद मैं आसानी से हिंदी नहीं पढ़ सकता हूँ। सात सालों के बाद!

मैं ऐसा नहीं कह रहा हूँ कि मैं पढ़ नहीं सकता हूँ, या कि मुझे हमेशा शब्दकोश देखना है। बस यह है कि पढ़ते-पढ़ते मेरी आँखें कसती है; सर में दर्द आने लगता है: अँग्रेज़ी पढ़ने से इतना ज़्यादा दोगुना समय लगता है... उफ़!

Thursday, March 13, 2008

मेरी खिड़की से क्या देखता हूँ

सूर्यास्त घंटे में आएगा, तब तक पहाड़ी पर धूप चमक रहा है, हालाँकि सड़क छाया में डूब गए। मैं पूर्व की तरफ़ देखता हूँ, जहाँ से मैं लगभग छह महीने पहले यहाँ आया। उसी तरफ़ से बादलों का एक ख़ौफ़नाक फ़ौज आ रहा है। एक आदमी मेरे नीचे सड़क पर चल रहा है, और हालाँकि बारिश हुई कम से कम एक हफ़्ता गुज़रा और उस की कोई निशानी नहीं है, पर उस आदमी के हाथ में छाता है। मैं इस स्थान के लोगों का एक लक्षण समझता हूँ कि वे हमेशा छाता रखते हैं, चाहे वह तेज़ धूप के नीचे चलते हैं (इस देश में लोग बारिश से डरते हैं, धूफ से नहीं। जो दृश्य हिंदी फ़िल्मों में होते हैं जिनमें आशिक-माशुक बारिश में नाचते हैं, वे मुझे अजीब ही लगते हैं)। कई बार मैं आकस्मिक बारिश में भीगा बन गया।

लेकिन बारिश यहाँ कम होती है, धूप ज़्यादा। हिंदुस्तान में यह स्थिती ऐसी ही थी लेकिन फ़र्क यह है कि यहाँ धूप में गरमी नहीं होती है। मैं कोई मौसम विज्ञानी नहीं हूँ लेकिन यहाँ के मौसम में कोई कमज़ोरी नहीं है। पर यहाँ की भूमी की कमज़ोरी ज़रूर है कि यहाँ किसी भी दिन पर बड़े से बड़े भुकांप की संभावता है जिसमें मेरा कमरा अवश्य नीचे गिरेगा। लेकिन तब तक में यहाँ पूरी सुख में रहूँगा।

मेरा शहर अपना विश्वविद्यालय के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ सात नोबेल प्राइज़ पुरस्कृत अध्यापक पढ़ाते हैं। यहाँ इतने नोबेल पुरस्कृत लोग आते रहते हैं कि उनकी गाड़ियों के लिए ख़ास जगहें रखी जाती हैं । मतलब है कि बुद्धिमान लोग बहुत हैं; लेकिन सामान्य बुद्धिमानी कम ही मिलेगी। एक और नोबेल से पुरस्कृत आदमी पढ़ाते थे; उसका नाम चेस्लौ मिलोज़ (czeslaw milosz) था के| क्योंकि वे पोलिश भाषा के प्रसिद्ध कवी थे इसलिए वे दोनों Slavic Studies और Comparative Literature विभागों में पढ़ाते थे। जब उनकी मृत्यु हुई तो वह पार्किंग स्पेस का सवाल उठा कि किस विभाग को जगह मिलेगी? इस बात पर बड़ी लड़ाई हुई। तीखेपन और ज़्यादा था इसलिए कि जो विभाग यहाँ Humanities कहलाते हैं (भाषा-विज्ञान, मनोविज्ञान, कला इत्यादी), उनको नोबेल पुरस्कार बहुत कम मिलता है--"ठोस" (hard) विज्ञानों को ज़्यादा।

जी हाँ, मेरे ख़्याल में आज तक में कई देशों में रह चुका हूँ: इर्लैंड, रूस, भारत, और अब कैलिफ़ोर्निया! यहाँ भी लोग पिज्जा ठीक से नहीं बना सकते हैं। न्यू यॉर्क की याद अभी भी आती रहती है, लेकिन यहाँ भी मुझे काफ़ी आनंद मिलता है, और सच बात यह है कि यहाँ से बहतर महौल शायद कहीं नहीं मिलेगा...

दोस्तों, मुझे पता नहीं कि कौन यह पढ़ेगा और एक बार फिर इस अजीबोगरीब हिंदी ब्लॉग पर ध्यान देगा। मैं यह भी नहीं बता सकता हूँ कि आगे मैं लिखता रहूँ कि नहीं। चाहूँगा ज़रूर, लेकिन मेरा इतना काम है कि मैं मुश्किल से खाना खाने का समय खोजता हूँ। लेकिन देखिये, आजकल मैं हिंदी खाता हूँ, पीता हूँ, और हिंदी के तकिये पर अपना सिर रखकर सोता हूँ। तो अगर मेरा दिमाग में इतनी हिंदी हो चुकी है, तो इस ब्लॉग पर कुछ फ़ालतू बातें डालना इतना कठिन काम नहीं होना चाहिए!

Tuesday, July 24, 2007

ब्लॉग्ज़ के मदद से हिन्दी सीखना

कुछ समय से मैं यह सोचा करता हूँ कि हिन्दी सीखने के लिए हिन्दी चिट्टाएँ बहुत फ़ायदेमंद हो सकती हैं। अभी भी राह दिखाई नहीं दिया है, लेकिन मैं फीर भी यह काम शुरू करना चाह रहा हूँ। मैंने यह विचार सोचा कि मैं एक दिलचस्प और आसान पोस्ट चुनकर उसका वर्नन के साथ एक शब्दावली दूँ। कहने की कोई ज़रूरत नहीं कि लेखक की सहायता भी बहुत ही अच्छी रहेगी।

मैं इस पोस्ट से यह काम शुरू करता हूँ, और हालाँकि दो शब्द मुझे मालुम नहीं, फीर भी मुझे लगता है कि छात्रों को फ़ायदा मिलेगा। यह बात भी है कि मैं अभी भी एक छात्र हूँ और आशा है कि हमेशा रहे! सो अगर आपको उन नीचेवाले शब्दों के अर्थ मालुम हैं जिनकी कोई प्रतिभाषा नहीं, तो एक टिप्पानी में हमें बता दीजिए।

ख़त: इस के साथ मैंने पहली बार कुछ अँग्रेज़ी भी लिखी है। हिन्दी पढ़नेवाले, बुरा मत मानिए, यह छात्र के लिए है।

Learn Hindi with Blogs

For a while now, I've been wondering how to make use of the growing Hindi blogosphere as a learning resource. I'm still not sure how to go forward, but one idea that I want to start right away is a series of posts picking out an interesting and readable post, and after giving a quick summary, detailing the relevant vocabulary. Of course, I invite and welcome the assistance of the blog writer him- or herself.

So, to begin: Kamran Perwaiz tells us about a new development in Delhi transportation. Hint: it's nothing good. I've put difficult words below:

तौबा f-"abjuring sin", repent
सफ़र m-journey
बल्कि -rather (as in: he's not your friend, (rather) he's a thief!): used to express disagreement with previous clause
तुगलकी
निजी -private
रफ़्तार f-speed
जानलेवा -mortal, deadly
आकडे
रौंदना -to thrash, trample
कुचलना -to crush, pound
रूखा -harsh, blunt, indifferent
नदारद -absent
फीसद -percent
परिवहन m-transportation (formal)
उपयोगm-use (formal)
हो हल्ला
पीसना -to grind, oppress; पीसी जा रही है -to be crushed (if object is feminine)
कामकाज़ी -working
मेहनतकश -hard-working, laboring
मज़बूर -helpless

मैं वापस आ गया, यानी

एक और बार मुझे कहना पड़ेगा कि मैं वापस आ गया और मुझे उनसे माफ़ माँगना पड़ेगा जो अभी-भी यह ब्लॉग पढ़ता है। अभी आप में से कौन-कौन बाकी है, यह मुझे बिल्कुल पता नहीं। पर, क्या करूँ?

बात एक: मुझे थोड़ा-सा ताज्जुब कि मैं बहुत ज़्यादा और लिखा करता था जब मैं अमेरिका में रहता था, और जब मैं हिन्दुस्तान गया, तो मैंने कमोबेस ब्लॉग को छोड़ दिया। लेकिन एक तरफ़ से समझा जा सकता है कि जितनी हिंदी मुझे बोलनी पड़ती है और लिखनी पड़ती है, इतनी कम ज़रूरत है ब्लॉग की। और एक और बात है कि मैं इतना व्यस्त था अपनी पढ़ाई में कि ब्लॉग लिखने का फ़ुरसत कभी निकला ही नहीं। और यह मेरी एक कमज़ोरी है कि मैं एक ख़राब correspondent हूँ--यानी मैं ठीक से सम्पर्क नहीं रखता हूं दोस्तों का।

लेकिन!

मैं वापस आ गया! यानी हिमालय के किसी पहाड़ी जंगल से नहीं, बल्कि देश से--यानी मैं न्यू यॉर्क में हूँ। और न्यू यॉर्क से में एक हफ़्ते में एक और नया देश जा रहा हूँ: कैलिफ़ोर्न्या! (दोस्तों, याद रखिए कि जितना फ़र्क है बम्बई और कलकत्ता के बीच में है, इतना ही फ़र्क है न्यू यॉर्क ओर कैलिफ़ोर्न्या) वहाँ University of California, Berkeley में अपनी हिन्दी की पढ़ाई अगे बढ़ाऊँगा

(एक ख़ुशी की बात है कि मेरी सरकार काफ़ी दानशील इस मामले में; हिन्दुस्तान में मेरा एक अध्यापक ने मज़ाक किया कि अगर कई पंडितों ने एक हवाई जहाज़ के ज़रिए के किसी अम्रीकी इमारत को गिराया होता, तो आज अम्रीकी सरकार संस्कृत सीखने के लिए भी पैसा दे रही होती! सच यह है कि अख़िर यह बात उसकी समझ में आई कि अंग्रेज़ी दुनिया की केवल भाषा नहीं है; आजकल मैं सिवाय इस बात के अपनी सरकार से बिल्कुल सहमत नहीं हूँ--मगर! अम्रीका में हम कहते हैं: तौफ़ेवाले घोड़े के मुँह में न देखो; क्या किसी को मालुम कोई इस जैसे-वाला मुहावरा हिन्दी में?)

एक और बड़ी ख़ुशी की बात: मुझे हिन्दी सिखाने का मौका मिला! मुझे भी ताज्जुब हुआ, लेकिन सब कुछ ठीक रहा। अंत में मैंने बहुत ही ख़ुद सिखा, और मेरे विद्यार्थियों ने भी। दरअसल मैं घबरा रहा था कि चुँकि हिंदी मेरी माँ-भाषा नहीं है, इसलिए वे मुझे उनके अध्यापक के लिए स्विकार नहीं करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, और क्लास के बाद एक ने मुझे बताया कि उसका ज़ोर बढ़ाया गया इस बात से कि अगर एक विदेशी हिन्दी सीख सकता है तो मैं क्यों नहीं सिखूँ? और मुझे लगता है उन्होंने ज़रूर बहुत सीख लिया--खासकर अगर मैं याद रखूँ कि यह बस तीन हफ़्ते का क्लास था (summer-school)|

ख़ैर मैं वापस आ गया, और यहाँ अपनी हिंदी को सँभालने के लिए मेरा यह इरादा है कि मैं इस ब्लॉग पर और भी लिखूँ, और मन में कई विचार भी है। एक है कि चूँकि मैं सिखाता जाना चाहता हूँ, इसलिए में उस के लिए इस ब्लॉग पर कुछ काम करना चाहता हूँ। इसलिए कभी-कभी मैं थोड़ी अँग्रेज़ी लिखूँगा हिंदी छात्रों के लिए।

सो दोस्तों, अगर आप अभी भी पढ़ रहे हैं, पढ़ते रहिये: मैं आपको नहीं बता सकता हूँ कि मैं रोज़ लिखूँगा, मगर यह वादा ज़रूर कर सकता हूँ कि जो भी मैं लिखता, मैं अपनी ही शैली में लिखूँगा और आपको कई मज़ेदार चीज़ें हमेशा बताने की कोशिश करूँगा। और कहने की कोई ज़रूरत नहीं है कि अगर मैं कभी कोई गलत करूँ, तो बता दीजिए (हमेशा की तरह)!

आगे: बाप रे बाप! मुझे बहुत ख़ुशी है कि सब लोग मुझे भुल गए नहीं, और इससे भी कि मुझे एकदम जवाब मिला! Udan Tashtari लिखता है कि ""दान की बछिया के दाँत नहीं गिने जाते'. यानि जब कोई गाय खरीदता है तो उसकी परख करने दाँत गिनता है मगर अगर गाय दान में मिल रही हो, तो क्या दाँत गिनना? पैसे तो लग नहीं रहे. :)" अरे वाह! अच्छी बात है कि वही मुहावरा चलता है हिन्दुस्तान में जो अम्रीका में चलता (और फीर भी चलता है हालाँकि मैं एक न्यू-यॉर्क का रहनेवाला हूँ जो, सच बताऊँ, घोरे के दाँतों से डरता हूँ!) ।

Thursday, December 07, 2006

अदीब ने गौर से देखा - वक्त और सिकुड़ गया। फिर वह एक ख़ूबसूरत सुनहले पंछी जैसे सोनहंस में बदल गया, जैसा पंछी कभी बाबर ने आगरा की गद्दी जीतने के बाद पहली बार देखा था। सोनहंस हवा में उठती-गिरती लहरों की तरह पंख चलाकर एक दिशा की ओर उड़ने लगा। उसके पंखों में कोई आवाज़ नहीं थी लेकिन तरह-तरह की रोशनियों के टुकड़े उसके बर्फ़ से सफ़ेद पंखों को छूते हुए गुज़रने लगे... और रोशनी के वे टुकड़े कागज़ों की तरह इधर-उधर उड़ने लगे...
देखते-देखते वे कागज़ जैसे पूरे ब्रह्मांड में भर गए और फिर ग्रन्थों की शक्ल में तब्दील होने लगे... बादशाहनामा, अमले सोलह, आलमगीरनामा, लतीफ़-उल-अख़बार, तारीख़े शुजाई, मुतख़ाबुल-लुबाब, मसीरुल-उमरा, दबिस्तान-उल-मज़ाहिब-ओशी... मनुची और बर्नियर के वृत्तान्तों के पन्ने फड़फड़ाने लगे... दस्तावेज़ों का एक महल-सा बन गया!

-कितने पाकिस्तान से

मैंने वह लिखा क्योंकि मैं इस उपन्यास की संरचना पर ज़िक्र करना चाहता हूँ। कई महिनों से (शुरू करके मैंने उसको छोड़ दिया अब तक) मुझे बहुत दिलचस्पी है इस उपनयास में, और अभी भी ठीक से नहीं समझा सकता हूँ। शायद मेरेलिए सब से रहस्यभरी बात यह है कि इस उपन्यास का मुख्य-पात्र, जिसको अदीब कहलाता है, मेरी नज़र में पूरी तरह से अस्तित्व नहीं। यानी मैं मानता हूँ कि वह इस कहानी का केन्द्र है, पर उसकी अभीप्रेर्णा और उसकी फितरत ठीक नहीं देख सकता हूँ। सच में अगर आपने पढ़ा हो तो आप भी सोचें कि यह अदीब के पास एक कमज़ोरी है (सही शब्द?) भाषण देने की; यानी, कभी वह बोलता रहता है, और हर बार कोई नहीं सुन रहा है।

फीर भी वह इस उपन्यास की चावी है। मेरी दृष्टि में यह साबित गया जब वह सलमा के पास था मौरीशस में। मैं ठीक से नहीं जानता हूँ इस हिस्सा का मतलब, जानता ही हूँ कि वह उपन्यास के केन्द्र में ही है। शायद इन सब में यह सच है कि हम, जो आम इंसान ही हैं, इतिहास और हमारे ऐतिहासिक और धार्मिक हिंसा से भागने की कोशिश करते रहते हैं?

ख़ैर, यही इतिहास की तस्वीर ज़रूरी है जो यहाँ मैंने उतारा: एक हंस जिसकी पंखें कागज़ से बनती हैं, ग्रन्थों और अलग-अलग नामाओं से बनती हैं।

और हाज़ीर है मानिश कि मैं आपसे पूरी तरह से सहमत नहीं हूँ: मैं इससे राज़ा हूँ कि अगर आप बस उसके घोषित संदेह की दृष्टि से ही देखें तो वह ज़रूर उभाव होगा, लेकिन मैं यह भी महसूस करता हूँ कि यह उपन्यास सिर्फ़ बेवजह हिंसा की विरोध में है, बल्कि कुछ और है उसमे, और सच मैं सोचता हूँ कि जो उसका राज़ हो, वह उसके कथा शिल्प में ही है...

लेकिन क्योंकि जो भी मैं पढ़ता हूँ, उस पर इतना ध्यान देना पड़ता है, इसलिए मैं शायाद और देखता हूँ जो हक़ीक़तन नहीं।

Monday, December 04, 2006

क्या किसी ने कितने पाकिस्तान कभी पढ़ा?

या क्या कोई वह पढ़ रहा है?

मैं उस के बारे बात करना चातहा हूँ लेकिन अब पढ़ने से सर भर गया है (मुझे ठीक मलुम है कि कोई वह हिन्दी में कभी नहीं कहता है)। एक पन्ना में मैंने कम-से कम दस ऐतिहासिक नाम देखे पहली बार, सारी दुनिया से...

Wednesday, November 29, 2006

मेरा नाम

मुझे बहुत ख़ुशी थी कि इतने लोगों ने मेरे पीछले ख़त पर टिप्पनी लिखी; लगता है कि किसी तरह से मैंने एक बात की जो आप लोगों के मनों में गूँजती गयी, और वह एक ख़ास और अनूठी बात ही है जो ऐसे भाव उभार सकती है। (काश वह इतनी प्रभावित होती कि मैं और लिख पाऊँ।)

मगर इन टिप्पणियों में लिखा गया था कि लोग मेरे बारे में और जानना चाहता है। क्यों अंत में मैं इकलौता बच्चा हूँ, मैं अपनेबारे बात करना बहुत पसंद करता हूँ। तो अब छोटी-सी तस्वीर बनाने की कोशिश करूँगा।

मेरे देश में मेरा नाम इतना अजीब नहीं था (यानी मुझे कभी नहीं वह परेशानी थी जो मेरे स्कूल के दोस्त रंजीत पर पड़ी, जिसको हमेशा "रांजी" कहता था।) लेकिन बहुत आम भी नहीं था। इसमें कुछ राहत मिली, क्योंकि नहीं चाहता था कि मैं कोई "क्रिस" या "माईकल" होऊँ, जिसको पूरे जीवन में बटकना चाहिए होगा दुसरे क्रिसों और माईकलों से मिलते-मिलते। मुझे बहुत कम किसी दुसरे "ग्रेग" से मिलता है, और जब भी ऐसा होता है, तभी संदेही हो जाता हूँ: यह कौन है जो मेरे अपने नाम के शाल में इधर-उधर फ़ैरता रहता?

लेकिन अगर वह बड़ा लाभ उठा सकता हूँ अपने नाम से, यह कमज़ोर भी है कि अगर मैं केवल "ग्रेग" हूँ जो मैं जानता हूँ, तो उस नाम की आवाज़ मेरी ही है। मतलब है कि चौबीस सालों बाद जो भी नसफल मेरी ज़िंदगी में, जो भी लज्जित (सही?), वह मेरा ही है - और मेरे नाम का। यानी जब में नौजवान था और हमेशा उदासी और self-absorption में डुबा हुआ था, तो मेरे नाम की आवाज़ सुनते पर ही शर्म से काँपता था।

अभी मैं इतना गंभीर नहीं हूँ और भी मैं रहता हूँ ऐसा जगह में (जयपुर) जहाँ मेरा नाम इतना आम नहीं। बहुत शुक्रगुज़ार हूँ कि एक ग्रेग चैपल इंडिया के क्रिकट टीम का मैनजर है।

एक बार मैंने पढ़ा कि मेरा नाम का मतलब है "देखनेवाला" है युनानी में। इससे दो और मतलब खींचे जाते है: गडरिया एक है, और इसलिए कैथलिक पोपों के लिए लोकप्रिय है: याद रखो कि हमारा कैलंडर Gregorian है:
किसी पोप ने बनाया। मगर एक और मतलब जो मुझे और अच्छा लगता है: चौकिदार। मैं कम सोता हूँ, और सच में अपना मन लगभग ग्यारह बजे ही तेज़ से चलने लगता है। मैं आदत से सोचना चाहता हूँ कि मैं पूरी रात दुनिया को देखबाल कर रहा हूँ: कम से कम एक दिन मैं ऐसा करूँगा अपने बच्चों के लिए।

Sunday, November 05, 2006

मेरे ब्लॉग का नाम

अभी श्रिश ने कहा कि मेरे ब्लॉग का नाम नहीं समझ पया। मैं सोचता हूँ कि श्रिश केवल नहीं है इस सवाल पुछने में। तो मैं समझाने की कोशिश करूँगा।

पहली बात है जब मैंने फ़ैसला किया कि मेरे ब्लोग के नाम को बदल दूँ, तो सोचते-सोचते मुझे कोई अच्छा नाम नहीं सुलझा। लोग कह सकते हैं कि शिर्षक में कुछ नहीं असली मतलब है, लेकिन फीर भी हम सब जानते है कि एक नाम में बहुत ही अर्थ है। मसलन मेरा नाम ग्रेग है और इंडिया में हिन्दी बोलनेवाले थोरे-से मुश्किल से उच्चारण कर पाते हैं (क्रेक? ग्रग? गर्ग?), लेकिन मैं कभी नहीं किसी नया नाम लूँगा जैसे चीनी लोग कभी लेते हैं। मेरा नाम ग्रेग है और वहीं मेरा नाम है, गौरव नहीं होगा :)। मैं भी महसूस करता हूँ कि जब हिन्दुस्तानी लोग बाहर जाते हैं तो अच्छी बात नहीं है कि "समीर" की जगह में समीर अपने-आप को "सैम" कहे। अगर आपका नाम की उच्चारण मुश्किल है तो लोग उच्चारण करने की कोशिश करने से कुछ सिखें, और सबसे ज़रूरी बात मेरेलिए यह है कि "समीर" का नाम में कोई ख़ास मतलब है जो "सैम" में नहीं।

ख़ैर नाम में कुछ मतलब ही हैं। (मसलन मैंने सुना है कि मेरे अपने नाम का मतलब है "रात का चौकिदार" येहूदी में।)

तो मैं कोई ठीक नाम नहीं ईज़ाद कर पा रहा था अपने ब्लॉग के लिए तब एक शाम मैं अपने पंखे को घूर रहा था। मैं अपने पंखे को घूरा करता हूँ जब भी मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ, या जब कोई गड़बड़ है (ठीक इस्तेमाल?) या जब कोई अमूर्त चीज़ को ध्यान दे रहा हूँ। तब तो मुझे ध्यान आया कि इस पंखे पर एक नाम छपा हुआ (दुलहन)। अंग्रेज़ी में हम कभी कहते "Eureka!" जब हम ऐसा सांस (लिंग ठीक है? और इस्तेमाल?) लेते हैं। एकाएक मुझे पता चला मेरे ब्लॉग का नाम।

तो शायद अभी हज़ीर है कि इस नाम में कोई ठीक नाम नहीं है इत्तेफ़ाक़ के अलावा। लेकिन यह सही नहीं। एक मतलब हो सकता है कि मैं कोई अजीब और नामाज़ेदार मज़ाक कर रहा हूँ एक मशहूर मोहवरे पर। लेकिन वह आकस्मिक है क्योंकि जब मैंने नाम दिया तो मैं उस के बारे में नहीं सोच रहा था। एक और मतलब है कि मैं मज़ाक कर रहा हूँ कि मैं इतनी गलतियाँ करता हूँ लिंग की। पर वह भी आकस्मिक। पहला मतलब यह है (और वह सच मैं थोरा-सा उदास है) कि मैं सोच रहा था कि जब तक मैं असली दुलहन मिल पाता हूँ, तब तक मेरी केवल साथी यह पंखा होगा!

तो अभी मुझे आशा है कि मेरे ब्लॉग का नाम और साफ़ है। सच में इस लेखने के पहले मेरे लिए भी उसका मतलब इतना साफ़ नहीं था...